
हमारी कहानी
एक ईमानदार कप चाय के इर्द-गिर्द बना टी-रूम
मिट्टी यानी धरती। यह नाम याद दिलाता है कि हमारे कुल्हड़ कहाँ से आते हैं, और उत्तर की पहाड़ियों में उगने वाली उन पत्तियों की भी।

हमारी कहानी
शुरुआत कैसे हुई
Mitti & Leaf की शुरुआत एक सीधे सवाल से हुई: सड़क किनारे की दुकान की चाय अक्सर कैफ़े की चाय से बेहतर क्यों लगती है? जवाब ढूँढ़ने पर हमें समझ आया कि फ़र्क़ छोटी-छोटी बातों में है — ताज़ा दूध, धैर्य से पकाना, और ऐसा बर्तन जो स्वाद को और निखार दे।
इसलिए हमने इन्हीं बातों के इर्द-गिर्द एक छोटा-सा कमरा सजाया। एक लंबा काउंटर, कुछ लकड़ी की मेज़ें, और एक केतली जो शायद ही कभी आराम करती है। मेन्यू जान-बूझकर छोटा है, ताकि काउंटर के पीछे के लोग हर कप पर पूरा ध्यान दे सकें।
हमारे मेहमान बांग्ला, हिंदी और अंग्रेज़ी बोलते हैं, अक्सर एक ही मेज़ पर। यह वेबसाइट भी इसीलिए तीनों भाषाओं में है: हर कोई मेन्यू उसी भाषा में पढ़ सके, जिसमें वह सोचता है।
हमें किन बातों की परवाह है
- 01
मिट्टी
शहर के कुम्हारों के बनाए मिट्टी के कुल्हड़। बिना चमक, सिर्फ़ एक बार इस्तेमाल, और फिर वापस मिट्टी में।
- 02
पत्ती
दार्जिलिंग, डुआर्स और असम के बागानों की चाय, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ख़रीदी हुई, ताकि ताज़ा रहे।
- 03
मोहल्ला
रोज़मर्रा के दाम, बैठने की जगह, और आप जो भी भाषा बोलें, उसमें स्वागत।
पत्ती से कुल्हड़ तक
- 1
पकाना
चाय पत्ती, पानी और साबुत मसाले धीमी आँच पर उबाले जाते हैं।
- 2
डालना
ताज़ा दूध मिलाया जाता है, फिर ऊँचाई से डालकर चाय में हल्का झाग लाया जाता है।
- 3
परोसना
सीधे मिट्टी के कुल्हड़ में — इतनी गरम कि जल्दबाज़ी की गुंजाइश ही नहीं।
टी-रूम के आसपास





तस्वीरें
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